महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यम - आर्थिक विकास के इंजन
डाॅ. रूचि अग्रवाल
अतिथि व्याख्याता, शा.डी.के. कालेज बलौदाबाजार.
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
उद्यमिता समाज की भावी आवष्कताओं का पूर्वानुमान करने तथा संसाधनो के नवीन सृजनात्मक एवं
कल्पनाषील संयोजनों के द्वारा इन आवष्यकताओं को सफलतापूर्वक पूरा करने का कार्य है। अगर सूक्ष्म
उद्यमों मे महिलाओं की भागीदारी को बढाया जाए तो उससे देष के सामने मौजूद दो संकट दूर हो सकते है-नौकरियों की संख्या मे बढोत्तरी और कार्यबल में महिलाओं की बढती भागीदारी सुनिष्चित करना। आमतौर पर हमारे देष में निजी उद्यम स्थापित करने के प्रति लोगों का सम्मान नही के बराबर है। हमारी षिक्षा प्रणाली ने ऐसे लोगों की भीड जुटायी है जो स्वतंत्र रूप से गतिविधियों का संचालन करने के बजाए दूसरों के अधीन काम करना ज्यादा पसंद करते है ।
KEYWORDS: महिला, उद्यम, आर्थिक विकास.
प्रस्तावना -
अध्ययन का उद्देष्य -
1. छत्तीसगढ मे महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों के आंकडे सभी उद्यमों के स्वामित्व से कम है, इसका मूल्यांकन करना ।
2. लाॅकडाउन के बाद महिला के स्वामित्व वाले उद्यमो पर प्रभाव का विष्लेषण करना।
3. महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों को प्रोत्साहन देने वाले विभिन्न षासकीय प्रमाण।
अध्ययन की परिकल्पना -
1. सूक्ष्म उद्यम में महिलाओं की हिस्सेदारी बढी है ।
2. शासकीय योजनाओं का लाभ महिला उद्यमी ने पर्याप्त रूप से लिया है ।
3. कोविड-19 के प्रभाव से हुये लाॅकडाउन के कारण महिला उद्यमियों का व्यवसाय ही अधिक प्रभावित हुआ है
भारत में महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों के आॅकडे सभी उद्यमों मे से केवल 20 फीसदी का स्वामित्व महिलाओं के पास है, जिसमें भी एक व्यक्ति वाले अनौपचारिक उद्यम ही अधिक है, स्वतः अपनी कहानी कहते है कि महिला उद्यमियों को पहचानने और उनकी सहायता की समस्या को किस तरह नजरअंदाज किया जाता है। अधिकतर महिला जो किसी कार्य जैसे मषरूम उत्पादन, बागवानी, सिलाई केन्द्र अथवा मसाला उद्योग आदि, इन्ही प्रकृति के कार्यो मे संलग्न है उन्हे परिवार की आय में योगदान देने वाली महिला के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनको उद्यमी नही माना जाता। लाॅकडाउन के बाद कई उद्यम केन्द्रो ने अपने यहाॅ से कामगारों की संख्या कम कर ली, बात छोटी है लेकिन बहुत अहम है। जो महिलायें अपना कारोबार चलाती है उनको जीवनयापन करने के नजरिये से देखा जाता है न कि एक उद्यमषीलता के नजरिये से, इस तरह वे सामाजिक और संरचनात्मक बंधनो को लेकर और अधिक असुरक्षित हो जाती है।
वर्ष 2010 से 2015 के बीच जिस दौरान निर्णायक आॅकडे मौजूद है, उससे स्पष्ट है कि महिला स्वामित्व वाले उद्यमों की हिस्सेदारी नही बढी है। महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यम छोटे और कम उत्पादक है। तीन या उससे अधिक मजदूर वाले महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों की हिस्सेदारी 2.7 प्रतिषत है जबकि पुरूषों का 6.3 प्रतिषत है। अगर सूक्ष्म उद्यम में महिलाओं की हिस्सेदारी बढाई जाती है तो इससे देष की दो अहम समस्याओं, रोजगार वृद्धि और कामकाजी महिलाओं की घटती भागीदारी का निदान हो जाता है।
कंसलटेंसी कम्पनी ब्रेन एंड कम्पनी की 2019 मे प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुमान में बताया गया है कि भारत में महिला उद्यमियों द्वारा 2030 तक 15 से 17 करोड रोजगार उत्पन्न करने की क्षमता है। एक अनुमान यह भी है कि वर्ष 2030 तक देष में केवल महिलाओं के लिए ही 40 करोड रोजगार की जरूरत पडेगी और यदि इसका समाधान नही ढूंढा गया तो महिलाओं और पुरूषांे के बीच आर्थिक और रोजगार के मोर्चे पर बनी खाई और चैडी होगी।
पिछले दो दषकों से सूक्ष्म उद्योग काफी हद तक स्थिर है। ऐसे मे जो महिलायें उद्यम लगाती है, वे पुरूषांे की तुलना में ज्यादा प्रभावी है। वे सामाजिक बाध्यता के साथ-साथ पूंजी तक पहुँच, टेक्नालाॅजी और बाजार दोनो मोर्चो पर प्रभावी है। अजीज प्रेमजी यूनिवर्सिटी के मुताबिक कारोबार बढाने मे महिलाओं के सामने सबसे बडी बाधा पर्याप्त पूँजी तक उनकी पहुँच की है, यह तथ्य सूक्ष्मऋण की व्यवस्था के विपरित है।
प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत कुछ ऋण में करीब 70 फीसदी महिलायें है। यह योजना आसानी से महिलाओं को ऋण मुहैया कराने मे सफल तो है लेकिन अधिकतर ऋण अग्रिम राषि के रूप षिषु या सूक्ष्ण श्रेणी (50,000/- रूपये तक) के है। स्वयं की सम्पत्ति आदि का न होना ऋण लेने की मुख्य बाधा होती है।
निष्कर्ष-
महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों के बारे में एक बडी बात यह है कि आर्थिक आपदा मे भी स्वयं को, खडे रखने की क्षमता होती है। भारत सरकार तथा विष्व बैंक की सहायता से चलाये जाने वाले राष्ट्र्ीय ग्रामीण आर्थिक रूपांतरण परियोजना तथा राष्ट्र्ीय ग्रामीण आजीविका परियोजना जैसी परियोजनायें महिलाओं को स्वयं के स्वामित्व वाले उद्यम स्थापित करने मे उल्लेखनीय रूप से सहयोग कर रही है।
संदर्भित सूची -
1. देषपाण्डेय डाॅ. सुलोचना श्रीहरि - भारतीय समाज मे कार्यषील महिलायें - वर्ष 2002
2. संदर्भ छत्तीसगढ - पत्रकार प्रकाषन प्रा. लि. रायपुर - 2009
3. योजनाएं - छत्तीसगढ महिला को, रायपुर – 2007
Website –
1- www.msme.gov.raipur.in
2- www.cedmapindia.org.in
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Received on 23.09.2021 Modified on 26.10.2021 Accepted on 29.11.2021 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(3):150-151.
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